हंगामे ने रोका पीएम का भाषण, 22 साल बाद बिना संबोधन के पारित हुआ धन्यवाद प्रस्ताव, विपक्ष पर गंभीर आरोप

नई दिल्ली। संसद के बजट सत्र के दौरान लोकसभा में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव को भारी हंगामे के बीच ध्वनिमत से पारित कर दिया गया, यह संसदीय कार्यवाही इसलिए ऐतिहासिक बन गई क्योंकि लगभग 22 वर्षों बाद पहली बार प्रधानमंत्री ने इस प्रस्ताव पर सदन में अपना संबोधन नहीं दिया।

जानकारी के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लोकसभा में मौजूद थे और चर्चा में भाग लेने के लिए तैयार भी थे, लेकिन लगातार बढ़ते शोर-शराबे और सुरक्षा संबंधी चिंताओं के चलते पीठासीन अधिकारी को कार्यवाही स्थगित करनी पड़ी,इसके कारण प्रधानमंत्री का भाषण नहीं हो सका और प्रस्ताव उनके वक्तव्य के बिना ही पारित कर दिया गया।



सुरक्षा को लेकर बढ़ी चिंता

संसदीय सूत्रों के मुताबिक, विपक्ष के विरोध को देखते हुए सुरक्षा एजेंसियों ने अतिरिक्त सतर्कता बरती थी, आशंका जताई जा रही थी कि सदन के भीतर स्थिति बिगड़ सकती है,इसी वजह से अतिरिक्त सुरक्षा व्यवस्था की गई, और किसी भी अप्रिय स्थिति से निपटने की तैयारी रखी गई,सूत्रों का कहना है कि लोकसभा के इतिहास में यह एक दुर्लभ घटना रही, जब प्रधानमंत्री मौजूद होने के बावजूद धन्यवाद प्रस्ताव पर नहीं बोले।

विपक्ष का सख्त रुख

इस दौरान कांग्रेस के निलंबित सांसद मणिकम टैगोर ने दावा किया कि विपक्ष की मांग है कि नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को अपनी बात रखने का पूरा अवसर दिया जाए, उन्होंने कहा कि जब तक विपक्षी नेताओं को बोलने का मौका नहीं मिलता, तब तक सदन की कार्यवाही सुचारू रूप से नहीं चलने दी जाएगी।

सहमति बनाने की कोशिश नाकाम

लोकसभा सचिवालय से जुड़े अधिकारियों के अनुसार, स्थिति को सामान्य बनाने के लिए विपक्षी दलों के वरिष्ठ नेताओं से बातचीत की गई, लेकिन इसका कोई सकारात्मक परिणाम नहीं निकला,हंगामा जारी रहने के कारण सदन की मर्यादा और सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए, प्रधानमंत्री के भाषण को टालने का फैसला किया गया।

सत्तापक्ष का पलटवार

वहीं, भाजपा सांसद मनोज तिवारी ने विपक्ष पर तीखा हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने जानबूझकर सदन का माहौल बिगाड़ा और प्रधानमंत्री के संबोधन को रोकने के लिए सुनियोजित ढंग से अव्यवस्था फैलाने की कोशिश की तिवारी ने कहा कि समय रहते हालात पर काबू पा लिया गया, जिससे कोई अप्रिय स्थिति नहीं बनी,इस पूरे घटनाक्रम ने संसद की कार्यप्रणाली और राजनीतिक टकराव को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।