कांकेर जिले में धान खरीदी व्यवस्था चरमराई, हड़ताल से किसानों की बढ़ी परेशानी….

कांकेर। कांकेर जिले में धान खरीदी इस बार गंभीर अव्यवस्थाओं से जूझ रही है,धान खरीदी प्रबंधक और ऑपरेटरों की हड़ताल के कारण दो दिन बीत जाने के बाद भी जिले में धान खरीदी प्रक्रिया शुरू नहीं हो पाई है,प्रशासन ने वैकल्पिक व्यवस्था के तौर पर राजस्व और कृषि विभाग के कर्मचारियों की ड्यूटी धान खरीदी केंद्रों में लगाई थी, लेकिन उन्होंने भी काम करने से मना कर दिया है।



जिला मुख्यालय से 15 किलोमीटर दूर स्थित पड़ौद धान खरीदी केंद्र कचरा केंद्र में तब्दील हो चुका है, न साफ–सफाई हुई है, और न ही कोई कर्मचारी केंद्र में पहुंचा है, टोकन कटवाने आए किसानों को मायूस होकर लौटना पड़ रहा है,यही स्थिति जिला मुख्यालय से 20 किलोमीटर दूर स्थित इच्छापुर धान खरीदी केंद्र की भी है, जहां किसी भी प्रकार की व्यवस्था नहीं नजर आ रही है।



जिला खाद्य विभाग के अनुसार कांकेर जिले में 149 धान खरीदी केंद्र संचालित हैं, जहां समर्थन मूल्य में धान विक्रय के लिए 94,192 किसानों का पंजीयन किया गया है, लगभग 85 प्रतिशत बारदाना उपलब्ध करा दिया गया है, लेकिन केंद्रों में व्यवस्था ठप होने से खरीदी प्रारंभ नहीं हो सकी है।



इधर, लैम्पस प्रबंधकों व ऑपरेटरों की हड़ताल के चलते पटवारियों और कृषि अधिकारियों की ड्यूटी धान खरीदी केंद्रों में लगा दी गई है, जिसका विरोध तेज हो गया हैं,पटवारियों का कहना है कि धान खरीदी उनका प्रबंधकीय कार्य नहीं है, यदि उनकी ड्यूटी वापस नहीं ली गई, तो वे भी हड़ताल पर जाने को मजबूर हो जाएंगे।



पटवारियों ने कलेक्टर को आवेदन देकर स्पष्ट किया है कि खरीदी केंद्र का प्रभार संभालना उनके कार्यक्षेत्र में नहीं आता वहीं कृषि विस्तार अधिकारी भी असंतोष जता रहे हैं। उनका कहना है कि मूल कार्य—रबी फसलों के लिए आदान सामग्री वितरण, फसल कटाई प्रयोग, पीएम किसान सम्मान निधि के हितग्राहियों का सत्यापन और ई-केवाईसी—इन अतिरिक्त जिम्मेदारियों के चलते प्रभावित होंगे।



इधर किसान अपनी उपज लेकर केंद्रों के चक्कर लगाने को विवश हैं, अव्यवस्था से नाराज किसानों का कहना है कि यदि जल्द खरीदी शुरू नहीं हुई, तो उनकी फसल खराब होने का खतरा बढ़ जाएगा,कुल मिलाकर, कांकेर जिले में धान खरीदी व्यवस्था पूरी तरह से अस्त-व्यस्त है, और इसका सीधा असर सबसे अधिक किसानों पर पड़ रहा है। प्रशासन, हड़ताली कर्मचारी और किसान—तीनों के बीच गहराता यह संकट जल्द समाधान की मांग कर रहा है।