घर का जोगी जोगना आन गांव का सिद्ध…

रायगढ़। 41वें चक्रधर समारोह का शुभारंभ बीते दिन राज्यपाल के कर-कमलों से हुआ, इस बार समारोह की शुरुआत एक ऐतिहासिक कवि सम्मेलन के साथ हुई, जो अब तक के इतिहास में पहली बार आयोजित हुआ, लेकिन इस समारोह की सबसे चर्चित बात रही एक चर्चित दिल्ली के कवि की उपस्थिति – जो लगातार तीसरे वर्ष इस मंच पर आमंत्रित किए गए हैं।

क्या यह सांस्कृतिक शोषण नहीं है?

ज्ञात हो कि यह वही कवि हैं, जिन्होंने पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार में रामायण महोत्सव के तहत 60 लाख रुपए लेकर रायगढ़ की धरती पर कार्यक्रम किया था,और अब बीजेपी सरकार में भी लगातार बुलाए जा रहे हैं, सूत्रों के अनुसार इस बार भी उन्हें 40 से 45 लाख रुपए के बीच पारिश्रमिक दिया गया है, यानी, बीते 3 वर्षों में लगभग डेढ़ करोड़ रुपए एक ही कवि को दिए जा चुके हैं – वह भी एक ऐसे राज्य से, जहां के स्थानीय कलाकारों को 1 लाख पारिश्रमिक भी मुश्किल से मिलता है।

स्थानीय कलाकारों के लिए क्यों नहीं समान अवसर…?

छत्तीसगढ़ के स्थानीय कलाकार, कवि, साहित्यकार सालभर मेहनत करते हैं, अपनी संस्कृति और बोली को आगे बढ़ाने के लिए संघर्ष करते हैं, लेकिन जब ऐसे बड़े आयोजनों की बात आती है, तो उन्हें हाशिए पर धकेल दिया जाता है।

कई बार तो कार्यक्रम इसीलिए रद्द कर दिए जाते हैं क्योंकि उन्होंने थोड़ी-सी उचित राशि की मांग कर ली होती है।

छत्तीसगढ़ का स्वाभिमान कब जागेगा…?

एक कवि की लगातार तीन बार उपस्थिति और करोड़ों रुपए का व्यय यह बताता है कि उन्हें सरकारें बदलने से फर्क नहीं पड़ता – वे हर सत्ता में अपनी पकड़ मजबूत बनाए हुए हैं। उनकी सबसे बड़ी कला मंच से ‘चमचागिरी’ और नेताओं की प्रशंसा को कला के रूप में प्रस्तुत करना है, जो उन्हें हर सरकार का चहेता बना देती है।

आज जरूरत है कि छत्तीसगढ़ के जनप्रतिनिधि, मंत्री और नीति-निर्माता यह सोचें कि छत्तीसगढ़ी कलाकारों को दरकिनार कर बाहरी चेहरों को करोड़ों देना किस हद तक न्यायसंगत है? क्या छत्तीसगढ़ की माटी में जन्मे कलाकारों में वो प्रतिभा नहीं है? क्या वे मंच पर छत्तीसगढ़ की आत्मा को नहीं उतार सकते?