वार्ड नंबर 29, मरीन ड्राइव: अकेले संघर्षरत पार्षद, पार्टी ने किया किनारा, विरोधी बने सहारा….!!

रायगढ़। स्थानीय पार्षद द्वारा अपने वार्ड के मुद्दों को लेकर लगातार संघर्ष किए जाने के बावजूद, न तो उनकी पार्टी के अन्य सदस्य और न ही समिति के उनके सहयोगी उनके साथ खड़े नज़र आ रहे हैं, यह स्थिति न केवल चौंकाने वाली है, बल्कि राजनीतिक व्यवहार और दलगत समर्थन पर गंभीर सवाल भी खड़े करती है।



वार्ड नंबर 29 के पार्षद, जो बीते कुछ हफ्तों से मरीन ड्राइव क्षेत्र से जुड़ी समस्याओं के समाधान के लिए अथक प्रयास कर रहे हैं, अपने सीमित संसाधनों और अधिकारों के बावजूद जनता के हित में निरंतर जुटे हुए हैं, चाहे वह सीवेज की समस्या हो, सड़कों की दुर्दशा, या पर्यावरणीय मुद्दे — पार्षद ने हर स्तर पर आवाज़ उठाई है।

कहर बनकर टूटने की भी चर्चा


हालांकि, इस संघर्ष में जो बात सबसे ज्यादा खलने वाली है, वह है उनकी पार्टी की उदासीनता,पार्टी के किसी भी पदाधिकारी या अन्य पार्षदों ने अभी तक न तो उनके प्रयासों का समर्थन किया है, और न ही मैदान में उतरकर उनका साथ दिया है, इसके उलट, कुछ विपक्षी नेता, भले ही देर से ही सही, अब उनके प्रयासों के साथ खड़े नज़र आ रहे हैं — जो एक मिसाल भी है और कटाक्ष भी।

एसडीएम गुहर लगतें



स्थानीय निवासी भी इस पर प्रतिक्रिया दे रहे हैं। एक स्थानीय नागरिक ने कहा, “हमने वोट देकर जिस पार्टी को चुना था, वही हमारे पार्षद को अकेला छोड़ चुकी है। कम से कम विपक्ष तो ज़मीनी सच्चाई समझ कर साथ आया है।”



राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है,कि यह घटनाक्रम पार्टी के आंतरिक ढांचे और कार्यशैली पर सवाल खड़े करता है,यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या पार्टी आने वाले दिनों में अपनी स्थिति में बदलाव लाती है, या फिर पार्षद को इसी तरह अकेले संघर्ष करना पड़ेगा।



वार्ड 29, मरीन ड्राइव: अकेले संघर्षरत पार्षद – पार्टी पदाधिकारी बन बैठे मूक दर्शक, विरोधियों की संवेदनशीलता बनी सहारा

शहर में चर्चा जोरों पर….
वार्ड नंबर 29 में चल रही जनसमस्याओं के निराकरण के लिए जहां स्थानीय पार्षद और उनके प्रतिनिधि पूरे मनोयोग से प्रयासरत हैं, वहीं उनकी ही पार्टी के पदाधिकारी उनके संघर्ष में न केवल अनुपस्थित हैं, बल्कि चुपचाप तमाशा देखने की भूमिका में नजर आ रहे हैं,यह स्थिति अब केवल राजनीतिक असंवेदनशीलता नहीं, बल्कि नैतिक प्रश्न भी बन गई है।

क्या कहतें हैं भाराद्वाज रामजाने


कलेक्टर निवास वक्त के बाहर ‘छुपे’ पार्टी पदाधिकारी…?
गौरतलब है कि हाल ही में जब पार्षद एवं उनके प्रतिनिधि क्षेत्रीय समस्याओं को लेकर कलेक्टर से मिलने पहुंचे, तब वहां उनकी ही पार्टी के कुछ निगम पदाधिकारी आस-पास के घरों में छिपते देखे गए। स्थानीय सूत्रों के अनुसार, वे वहां सिर्फ “स्थिति की नब्ज़ देखने” आए थे, लेकिन खुलकर साथ देने का साहस नहीं जुटा पाए। यह दृश्य न केवल असहज करने वाला था, बल्कि इस बात का संकेत भी है, कि पार्टी के अंदर पारदर्शिता और एकजुटता का अभाव है।



महापौर का ‘अदृश्य होना’ बना चर्चा का विषय
इसके बाद जब पार्षद प्रतिनिधि महापौर से मिलने उनके निवास पहुंचे, तो बताया गया कि महापौर घर पर मौजूद नहीं हैं। यद्यपि यह एक सामान्य परिस्थिति हो सकती है, परंतु मौजूदा संदर्भ में यह भी चर्चा का विषय बन गया है — क्या महापौर भी जानबूझकर इस विवाद और जनदबाव से दूर रह रहे हैं? क्या वे भी “दूर से हालात देखते” हुए मौन साधे हुए हैं?


विपक्ष का समर्थन – संदेश में उलटफेर
जहां सत्ता पक्ष से समर्थन गायब है, वहीं विपक्ष के कुछ नेता अब सामने आकर पार्षद के प्रयासों की सराहना करते दिख रहे हैं,यह राजनीतिक परिदृश्य में एक असामान्य किंतु स्वागतयोग्य बदलाव है। यह घटना न केवल सत्ता पक्ष की निष्क्रियता को उजागर करती है, बल्कि विपक्ष की बदलती भूमिका को भी रेखांकित करती है।



जनता के मन में सवाल – “क्या यही है जनप्रतिनिधित्व?”
स्थानीय नागरिकों का कहना है,कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि जिस पार्टी ने पार्षद को टिकट दिया, वही अब उन्हें संघर्ष में अकेला छोड़ चुकी है, एक बुजुर्ग मतदाता ने व्यंग्य में कहा, “नेताओं का डर तो समझ आता है, पर छिप-छिपकर देखना नई राजनीति की परिभाषा है क्या…?”

एसडीएम रायगढ़



अब यह देखना होगा कि पार्टी नेतृत्व इस ‘सामूहिक चुप्पी’ को तोड़ता है, या नहीं। फिलहाल, एक अकेले पार्षद की यह जद्दोजहद न केवल प्रेरणादायक है, बल्कि सत्ताधारी दल के लिए एक कठोर आईना भी।