अनोखी परम्परा, बंधा मतऊर मेला का हुआ आयोजन, मछली पकड़ने एकत्रित हुए हजारों ग्रामीण देखें वीडियो…..

कोंडागांव । कोंडागांव जिले के माकड़ी ब्लाक अंतर्गत ग्राम बरकई में वर्षो पुराने मालगुजारो के जमाने से चली आ रही अनोखी परंपरा तालाब मतऊर मेला का आयोजन बड़े ही धूमधाम के साथ किया गया। यह आयोजन 14 वर्ष बाद किया गया। इस आयोजन में जिसमे ग्राम बरकई सहित कई गांव से ढाई हजार से अधिक ग्रामीण शामिल हुए। सभी लोगों ने तालाब में मछली पकड़कर इस पुरानी परंपरा का निर्वहन किया ।

बंधा मतऊर मेला का आयोजन, मछली पकड़ने एकत्रित हुए हजारों ग्रामीण

इस परंपरा में सर्वप्रथम गाजा बाजा के साथ ग्राम प्रमुख मालगुजार रामप्रसाद पांडे को सभी ग्रामीणों द्वारा ससम्मान तालाब स्थल में ले जाया गया, मालगुजार के द्वारा विधिवत पूजा करने के बाद सभी लोगों को तालाब में मछली पकड़ने की अनुमति दी गई। जब तक मालगुजार रामप्रसाद पांडे के द्वारा आदेश नहीं दिया जाता तब तक कोई भी व्यक्ति तालाब में मछली नहीं पकड़ता, लगभग डेढ़ से दो घंटे तक मातारानी को प्रसन्न करने बाजा बजाया जाता है ।

पुरानी परंपरा अनुसार मतऊर मेला में मछली पकड़ने 60 गांव के ढाई हजार से अधिक ग्रामीण हुए शामिल

इसी दौरान ग्रामीणों द्वारा तालाब में मछली पकड़ने के लिए कई प्रकार के जाल का उपयोग करते हैं, लगभग डेढ़ घंटे तक मछली पकड़ा जाता है , जिसके बाद पुनः मालगुजार के आदेश पर मछली पकड़ना बंद कर किया जाता है। ग्रामीणों का मानना हैं की इस पर्व में सीमित समय तक लोगो को तालाब में बड़ी संख्या में छोटी बड़ी मछली मिलती है, मालगुजार के मना करने के बाद अगर कोई व्यक्ति तालाब में मछली पकड़ने जाता है तो वह मछली नही पकड़ पाता ।

14 साल बाद हुआ तालाब मतऊर मेला, 2008 में अंतिम बार हुआ था मतऊर मेला

इस वर्ष लगभग 2500 जाल लेकर दर्जनों गांव के ग्रामीण बड़ी संख्या में एकत्रित हुए थे और सभी लोगों ने अपने अपने जाल से तालाब में मछलीया पकड़ी, अधिक से अधिक 10 किलो तक मछली पकड़ा। बरकई के ग्रामीणों ने बताया यह बंधा मतऊर मेला का आयोजन अंतिम बार 2008 में किया गया था, शासन प्रशासन की विसंगति के कारण तालाब को लीज में दे दिया गया था जिसके चलते 14 सालों तक यह परंपरा का निर्वहन नहीं हो पाया था ।

तालाब को लीज में देने के कारण बन्द था मछली पकड़ने की परंपरा

स्थानीय ग्रामीण

लेकिन इस वर्ष ग्राम बरकई में ग्राम सरपंच बलिराम के द्वारा बैठक का योजना कर शीतला मंदिर में माता शीतला के आदेश पर पुनः इस परंपरा को 14 साल बाद इस परंपरा को पुनः प्रारंभ किया गया । ग्रामीणों ने बताया यह अनोखी परंपरा बस्तर से लेकर छत्तीसगढ़ तक कहीं भी नहीं मनाया जाता है । यह परंपरा गांव में मालगुजार के जमाने से चली सा रही हैं सहित आसपास गांव से आए हुए ग्रामीण मौजूद रहे ।